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अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल,

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अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल से रंग ओ बू नदारद है , अब हर एक कूचे से सियासत की बदबू सी आती है । एक ग़ज़ब की तिस्नगी थी मौसम ए नज़ाक़त की जुस्तजू में , सर्द सेहरओं

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अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल से रंग ओ बू नदारद है , अब हर एक कूचे से सियासत की बदबू सी आती है । एक ग़ज़ब की तिस्नगी थी मौसम ए नज़ाक़त की जुस्तजू में , सर्द सेहरओं

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अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल से रंग ओ बू नदारद है , अब हर एक कूचे से सियासत की बदबू सी आती है । एक ग़ज़ब की तिस्नगी थी मौसम ए नज़ाक़त की जुस्तजू में , सर्द सेहरओं

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