ख़्वाबों में ही बस हँसने की रवायत हो जहां ,

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ख़्वाबों में ही बस हँसने की रवायत हो जहां , ऐसी नींदों के ख्यालों से भी डर लगता है ।कभी पत्थरों से तोड़ा गया कभी जबीन पर मसला गया, हर बार राज़ ए ग़ुल को नरम

ख़्वाबों में ही बस हँसने की रवायत हो जहां , ऐसी नींदों के ख्यालों से भी डर लगता है ।कभी पत्थरों से तोड़ा गया कभी जबीन पर मसला गया, हर बार राज़ ए ग़ुल को नरम

ख़्वाबों में ही बस हँसने की रवायत हो जहां , ऐसी नींदों के ख्यालों से भी डर लगता है ।कभी पत्थरों से तोड़ा गया कभी जबीन पर मसला गया, हर बार राज़ ए ग़ुल को नरम

ख़्वाबों में ही बस हँसने की रवायत हो जहां , ऐसी नींदों के ख्यालों से भी डर लगता है ।कभी पत्थरों से तोड़ा गया कभी जबीन पर मसला गया, हर बार राज़ ए ग़ुल को नरम

ख़्वाबों में ही बस हँसने की रवायत हो जहां , ऐसी नींदों के ख्यालों से भी डर लगता है ।कभी पत्थरों से तोड़ा गया कभी जबीन पर मसला गया, हर बार राज़ ए ग़ुल को नरम

ख़्वाबों में ही बस हँसने की रवायत हो जहां , ऐसी नींदों के ख्यालों से भी डर लगता है ।कभी पत्थरों से तोड़ा गया कभी जबीन पर मसला गया, हर बार राज़ ए ग़ुल को नरम

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